मध्यप्रदेश कृषि भूमि संरक्षण अधिनियम, 1976
पहले यह समझिए कि यह कानून क्यों बना था। पुराने समय में गाँव का गरीब किसान जब मजबूरी में साहूकार से पैसा उधार लेता था, तो साहूकार अक्सर पैसे के बदले उसकी जमीन की रजिस्ट्री अपने नाम करवा लेता था। कहने को वह विक्रय होता था, पर असल में वह ऋण की प्रतिभूति थी। किसान सोचता था कि पैसा लौटाकर जमीन वापस ले लूँगा, पर कागज पर तो जमीन बिक चुकी होती थी। इसी “कुचक्र” से गरीब किसान को बचाने के लिए सरकार यह कानून लाई थी। इसलिए जहाँ भी ऐसा असली मामला सामने आए, वहाँ हमें पूरी संवेदनशीलता से किसान के पक्ष में खड़े होना है — यह हमारा विधिक और नैतिक दोनों कर्तव्य है।
अब आते हैं व्यावहारिक प्रश्न पर। समस्या यह है कि आजकल कुछ लोग इस अच्छे कानून का गलत उपयोग करने लगे हैं। जमीन के दाम बढ़ जाने के बाद, या पारिवारिक झगड़े के कारण, या विक्रय के बाद मन बदल जाने पर लोग पुरानी सीधी-सादी रजिस्ट्री को भी इस अधिनियम के तहत शून्य करवाने की कोशिश करते हैं। यहीं हमें सावधानी से काम लेना है — असली पीड़ित किसान की रक्षा करनी है, पर कानून के दुरुपयोग को भी रोकना है।
सरल भाषा में यह समझिए कि यह अधिनियम हर रजिस्ट्री पर लागू नहीं होता। यह तभी लागू होता है जब तीन बातें एक साथ हों। पहली, आवेदक वास्तव में कमजोर वर्ग का छोटा किसान हो — उसके पास 8 हेक्टेयर से अधिक असिंचित या 4 हेक्टेयर से अधिक सिंचित जमीन न हो। दूसरी, जो दूसरा पक्ष है वह वास्तव में साहूकार हो, यानी पैसा उधार देने वाला व्यक्ति — केवल जमीन खरीदने वाला सामान्य व्यक्ति साहूकार नहीं होता। और तीसरी, सबसे जरूरी बात, रजिस्ट्री के पीछे ऋण की कहानी छुपी हो — यानी असल में वह कर्ज का मामला हो जिसे विक्रय का रूप दे दिया गया हो।
अब आपके मूल प्रश्न पर आते हैं कि क्या ग्राह्यता के स्तर पर ही प्रकरण समाप्त किए जा सकते हैं। इसका उत्तर है — हाँ, किए जा सकते हैं, पर बहुत सावधानी से। अधिनियम की धारा 6(1) स्वयं कहती है कि अनुविभागीय अधिकारी पहले एक प्रारंभिक जाँच करेगा और जब उसे यह विश्वास हो जाए कि मामला प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार का है, तभी वह विस्तृत जाँच में जाएगा। मतलब कानून ने ही आपको यह अधिकार दिया है कि पहले देखिए क्या यह मामला इस कानून के दायरे में भी आता है या नहीं।
पर यहाँ एक बात बहुत महत्वपूर्ण है जिसे मैं आपसे साझा करना चाहूँगा। ग्राह्यता पर आवेदन निरस्त करते समय हमें कभी भी जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। गरीब आवेदक अक्सर अपनी बात ठीक से कागज पर नहीं रख पाता। हो सकता है आवेदन में पूरी कहानी न लिखी हो पर असल में वह वास्तविक पीड़ित हो। इसलिए मेरी सलाह है कि ग्राह्यता पर निरस्त करने से पहले आवेदक को एक बार बुलाकर सुनिए, उससे पूछिए कि क्या उस रजिस्ट्री के पीछे कोई ऋण था, कोई मौखिक समझ थी, कोई पुनर्विक्रय की बात थी। यदि वह कहता है कि हाँ ऐसा था, तो प्रकरण को ग्राह्यता पर निरस्त नहीं करना चाहिए, बल्कि पूरी जाँच करनी चाहिए।
सरल व्यावहारिक नियम यह रखिए — जहाँ आवेदक वास्तव में छोटा किसान है, जहाँ दूसरा पक्ष गाँव का जाना-पहचाना साहूकार या पैसा उधार देने वाला है, जहाँ परिस्थितियाँ ऋण की कहानी की ओर इशारा करती हैं, वहाँ पूरी सुनवाई कीजिए, संदेह का लाभ आवेदक को दीजिए, क्योंकि यही इस कानून की आत्मा है। लेकिन जहाँ स्पष्ट है कि आवेदक बड़ा भू-स्वामी है, या दूसरा पक्ष कोई सामान्य खरीदार है जिसका साहूकारी से कोई लेना-देना नहीं, या विक्रय विलेख में कोई ऐसी शर्त या परिस्थिति नहीं जो ऋण की ओर संकेत करे, वहाँ तर्कसंगत आदेश पारित करके ग्राह्यता पर ही निरस्त किया जा सकता है।
कालिक परिसीमा के प्रश्न पर सरल भाषा में यह समझिए। मूल कानून 22 जनवरी 1977 तक के पुराने सौदों को देखता था। फिर 1988 में संशोधन हुआ जिसके बाद नए सौदे भी छह साल की अवधि में चुनौती दिए जा सकते हैं, पर केवल तभी जब वे साहूकार द्वारा किए गए ऐसे अंतरण हों जो कानून को धोखा देने के लिए किए गए हों। यानी पिछले पाँच साल की सीधी-सादी रजिस्ट्री, जिसमें साहूकार का कोई हाथ नहीं, वह इस कानून के दायरे में ही नहीं आती।
संक्षेप में मेरा सुझाव यही है कि हर प्रकरण में दो प्रश्न स्वयं से पूछिए। पहला, क्या इस आवेदन में सचमुच एक कमजोर किसान अपनी जमीन वापस माँग रहा है जो साहूकारी के कुचक्र में फँसकर उससे अलग हो गई थी? यदि हाँ, तो पूरी संवेदनशीलता से सुनवाई कीजिए, उदार दृष्टिकोण रखिए, कानून के संरक्षणात्मक उद्देश्य को पूरा कीजिए। दूसरा, क्या यह कोई व्यक्ति अपनी सामान्य रजिस्ट्री को केवल इसलिए उलटवाना चाह रहा है क्योंकि अब जमीन के दाम बढ़ गए हैं और वह इस कानून का गलत इस्तेमाल कर रहा है? यदि हाँ, तो कानून के आधार पर तर्कसंगत आदेश देकर ऐसे प्रकरण को उचित स्तर पर रोक दीजिए, क्योंकि इससे असली पीड़ित किसानों के मामलों में भी विलंब होता है और कानून की गरिमा भी प्रभावित होती है।
इस प्रकार आप कमजोर वर्ग की रक्षा भी कर सकेंगे और कानून के दुरुपयोग पर भी अंकुश लगा सकेंगे — यही इस अधिनियम के साथ न्याय करने का सही तरीका है। यदि आप चाहें तो मैं दो प्रकार के आदर्श आदेश तैयार कर सकता हूँ — एक जहाँ पूरी जाँच के बाद किसान को राहत दी जा रही हो, और दूसरा जहाँ ग्राह्यता पर ही आवेदन निरस्त किया जा रहा हो — ताकि दोनों प्रकार की परिस्थितियों में आपके पास सही विधिक ढांचा उपलब्ध रहे।
अधिनियम में धारा तीन में केवल 1980 तक के संव्यवहारों पर लागू होने का उल्लेख है, तो क्या उन्हें ग्राह्यता पर ही समाप्त किया जा सकता है?
सबसे पहले यह समझिए कि अधिनियम की विभिन्न धाराएँ अलग-अलग काम करती हैं, और अक्सर व्यवहार में धाराओं की भूमिका को लेकर भ्रम पैदा हो जाता है। आम बोलचाल में लोग कहते हैं कि “इस धारा में यह अवधि लिखी है”, पर जब हम अधिनियम को ध्यान से पढ़ते हैं तो पता चलता है कि कौन सी बात कहाँ लिखी है — यह बहुत महत्वपूर्ण है। अनुविभागीय अधिकारी के रूप में जब आप आदेश पारित करते हैं, तो गलत धारा का हवाला देना आदेश को अपील में कमजोर बना देता है, चाहे निष्कर्ष कितना भी सही क्यों न हो। इसलिए आइए एक-एक धारा को उसकी सही भूमिका में समझते हैं।
अधिनियम की धारा 3 को समझिए। यह धारा बहुत छोटी सी है पर बहुत शक्तिशाली है। यह केवल इतना कहती है कि इस अधिनियम के प्रावधान किसी भी अन्य कानून, रीति-रिवाज, करार, न्यायालय के आदेश या किसी प्राधिकारी के आदेश से ऊपर रहेंगे। यानी यदि किसी प्रकरण में कोई अन्य कानून इस अधिनियम से टकराता है, तो यह अधिनियम ही प्रभावी होगा। इसमें कोई तारीख नहीं है, कोई वर्ष नहीं है, 1980 का तो उल्लेख ही नहीं है। यह केवल अधिनियम की सर्वोच्चता स्थापित करने वाली धारा है — इसे अंग्रेजी में overriding clause या non-obstante clause कहते हैं। तो जब कोई कहे कि “धारा 3 में 1980 तक की अवधि लिखी है”, तो यह तथ्यात्मक रूप से गलत है। संभवतः यह भ्रम इसलिए पैदा होता है क्योंकि धाराओं को ठीक से पढ़े बिना सामान्य धारणा बना ली जाती है।
अब आते हैं असली कालिक परिसीमा पर, जो वास्तव में दो भिन्न धाराओं से निर्धारित होती है। धारा 4 मूल अधिनियम की आत्मा है। यह कहती है कि कौन से प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार इस अधिनियम के अंतर्गत राहत पाने के पात्र हैं। धारा 4 के अनुसार वे संव्यवहार पात्र हैं जो या तो नियत दिनांक यानी 1 जनवरी, 1971 को प्रवर्तमान थे, या उसके बाद किए गए, पर अधिनियम के राजपत्र में प्रकाशन की तिथि यानी 22 जनवरी, 1977 तक। इसका अर्थ यह है कि मूल अधिनियम की दृष्टि में वह ऐतिहासिक खिड़की 1 जनवरी, 1971 से 22 जनवरी, 1977 तक की है। इसी छह वर्ष की अवधि में हुए साहूकारी कुचक्रों से मुक्ति दिलाना अधिनियम का मूल उद्देश्य था।
अब प्रश्न उठता है कि फिर नए संव्यवहारों का क्या? क्योंकि अधिनियम बनने के बाद भी साहूकार नए-नए तरीके अपना सकते थे। इसी के लिए धारा 15 बनाई गई। मूल धारा 15(1) कहती है कि यदि कोई साहूकार ऐसी जमीन का आगे अंतरण करता है जो प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार का विषय हो, तो वह अंतरण इस अधिनियम को विफल करने के आशय से किया गया माना जाएगा और शून्य होगा। फिर 1988 में एक महत्वपूर्ण संशोधन आया जिसने धारा 15 में उप-धाराएँ (2) और (3) जोड़ीं। धारा 15(2) ने परिसीमा की व्यवस्था दी। इसके अनुसार दो स्थितियाँ बनीं।
पहली स्थिति यह कि यदि संव्यवहार 31 जनवरी, 1977 के बाद किन्तु 1988 संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से पहले का है, तो आवेदन 1988 संशोधन अधिनियम के प्रारंभ से पाँच वर्ष के भीतर करना होगा। दूसरी स्थिति यह कि यदि संव्यवहार 1988 संशोधन अधिनियम के प्रारंभ के बाद किया गया है, तो आवेदन संव्यवहार की तिथि से छह वर्ष के भीतर करना होगा। इसी छह वर्ष की अवधि को ध्यान में रखकर आज के प्रकरणों में कालिक परिसीमा की गणना होती है।
अब इस बात को जोड़िए अपने मूल प्रश्न से। जब कोई व्यक्ति पिछले पाँच वर्षों की रजिस्ट्री को इस अधिनियम के अंतर्गत शून्य कराने हेतु आवेदन प्रस्तुत करता है, तो तकनीकी रूप से वह धारा 15(2)(ii) की छह वर्ष की परिसीमा के भीतर है — यहाँ परिसीमा का आधार पर तो आवेदन निरस्त नहीं हो सकता। किन्तु वास्तविक प्रश्न परिसीमा का नहीं, बल्कि यह है कि क्या वह संव्यवहार धारा 15(1) के अर्थ में “साहूकार द्वारा अधिनियम को विफल करने हेतु किया गया अंतरण” है भी या नहीं। यदि दूसरा पक्ष कोई साहूकार नहीं है, यदि मूल रजिस्ट्री किसी प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार का विषय नहीं थी, तो धारा 15 का प्रावधान लागू ही नहीं होता, चाहे परिसीमा कुछ भी हो।
इसी प्रकार धारा 6 की भूमिका को भी समझ लीजिए, क्योंकि यही वह धारा है जिसके अंतर्गत आप अनुविभागीय अधिकारी के रूप में जाँच प्रारंभ करते हैं। धारा 6(1) आपको दो अधिकार देती है। एक, आप स्वप्रेरणा से किसी संव्यवहार की जाँच कर सकते हैं, और दूसरा, धारा 5 के अंतर्गत आवेदन प्राप्त होने पर आप जाँच कर सकते हैं। पर बहुत महत्वपूर्ण बात यह है कि धारा 6(1) आपसे अपेक्षा करती है कि पहले एक प्रारंभिक जाँच करके आप संतुष्ट हों कि संव्यवहार प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार है और धारा 4 लागू होती है — तभी आप विस्तृत जाँच की प्रक्रिया में जाएँगे। यानी ग्राह्यता पर छँटनी का अधिकार अधिनियम ने स्वयं आपको दिया है, और यह अधिकार धारा 6(1) से निकलता है, न कि कहीं और से।
अब अपने आदेशों के लिए एक व्यावहारिक सूत्र याद रखिए। जब आप ग्राह्यता पर आवेदन निरस्त कर रहे हों, तो आदेश में स्पष्ट रूप से लिखिए कि धारा 6(1) के अंतर्गत की गई प्रारंभिक जाँच में यह पाया गया कि आवेदक धारा 2(c) के अर्थ में कमजोर वर्ग का कृषि भूमि धारक नहीं है, अथवा प्रत्यर्थी धारा 2(d) के अर्थ में साहूकार नहीं है, अथवा संव्यवहार धारा 2(f) के अर्थ में प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार के किसी उप-खंड में नहीं आता, अथवा धारा 15(2) की परिसीमा के बाहर है। इन सभी को अलग-अलग परिभाषा धाराओं से जोड़िए, न कि केवल धारा 3 या 4 का सामान्य उल्लेख करके। जब आप इस प्रकार विशिष्ट धाराओं का हवाला देते हैं, तो आदेश अपीलीय स्तर पर भी मजबूत रहता है और कलेक्टर महोदय के समक्ष टिक जाता है।
इसी प्रकार जब आप कमजोर वर्ग के वास्तविक पीड़ित को राहत देने का आदेश पारित कर रहे हों, तो भी सही धाराओं का क्रमबद्ध हवाला दीजिए। धारा 2(c) के अर्थ में आवेदक कमजोर वर्ग का धारक है, धारा 2(d) के अर्थ में प्रत्यर्थी साहूकार है, धारा 2(f) के संबंधित उप-खंड के अनुसार संव्यवहार प्रतिषिद्ध ऋण संव्यवहार है, धारा 4 के अनुसार यह संरक्षण के योग्य है, और धारा 7(1)(ii) के अंतर्गत संव्यवहार शून्य घोषित किया जाता है एवं कब्जा बहाल किया जाता है। इस प्रकार की विधिक संरचना आदेश को सुदृढ़ बनाती है।
तो संक्षेप में यह समझ लीजिए कि इस अधिनियम में कोई भी धारा अकेले कालिक परिसीमा तय नहीं करती। धारा 3 overriding clause है, परिसीमा का प्रश्न इसमें है ही नहीं। धारा 4 मूल अधिनियम की कालिक परिधि यानी 1971 से 1977 तक के संव्यवहारों की बात करती है। धारा 15(2) नए संव्यवहारों यानी 1988 के बाद के अंतरणों के लिए छह वर्ष की परिसीमा देती है, पर केवल तभी जब वे अंतरण धारा 15(1) के दायरे में आते हों। और धारा 6(1) आपको ग्राह्यता के स्तर पर प्रारंभिक जाँच का अधिकार देती है। इन चारों धाराओं को मिलाकर पढ़ने से ही अधिनियम की पूरी कालिक और प्रक्रियात्मक संरचना स्पष्ट होती है।

