🔷 I. धारा 115 का पूर्ण विधिक ढाँचा (Legislative Framework)
धारा 115 का शीर्षक है “भू-अभिलेख में गलत या अशुद्ध प्रविष्टि का संशोधन” (Correction of wrong or incorrect entry in land record)। इस धारा में तीन उपधाराएँ (sub-sections) हैं, जो मिलकर एक त्रि-स्तरीय प्रणाली (three-tier system) बनाती हैं। इसे समझने के लिए इसे एक “relay race” की तरह सोचें — हर चरण में बैटन अगले अधिकारी को सौंपनी होती है, और कोई भी अधिकारी अपना चरण छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकता।
उपधारा (1) — SDO का मूल अधिकार:
अनुविभागीय अधिकारी (SDO) को यह शक्ति है कि वह स्वप्रेरणा (suo motu) से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, उचित जाँच के बाद, धारा 114 के अंतर्गत तैयार किए गए भू-अभिलेखों (किसान किताब एवं अधिकार-अभिलेख को छोड़कर) में किसी भी गलत, अशुद्ध या अनधिकृत प्रविष्टि को संशोधित कर सकता है। इसमें एक अत्यंत महत्वपूर्ण परन्तुक (Proviso) है: यदि संशोधन पाँच वर्ष से पुरानी किसी प्रविष्टि से संबंधित है, तो SDO Collector की पूर्व लिखित अनुमति (sanction in writing) के बिना कार्रवाई प्रारंभ ही नहीं कर सकता।
उपधारा (2) — प्रक्रियात्मक शर्तें (Procedural Safeguards):
SDO कोई भी आदेश पारित करने से पहले दो अनिवार्य शर्तें पूरी करेगा: (क) संबंधित तहसीलदार से लिखित प्रतिवेदन (written report) प्राप्त करना, और (ख) सभी हितबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देना। यहाँ फिर एक अत्यंत critical परन्तुक आता है — “जहाँ शासन का हित सम्बद्ध हो, वहाँ अनुविभागीय अधिकारी मामला कलेक्टर को प्रस्तुत करेगा।”
उपधारा (3) — Collector का अंतिम निर्णय अधिकार:
उपधारा (2) के अंतर्गत मामला प्राप्त होने पर, Collector ऐसी जाँच करेगा जो वह उचित समझे और ऐसा आदेश पारित करेगा जो वह उचित समझे। यहाँ “shall” शब्द का प्रयोग हुआ है — अर्थात् यह Collector का विवेकाधीन (discretionary) नहीं, बल्कि अनिवार्य कर्तव्य (mandatory duty) है।
🔷 II. “शासकीय हित” (Government Interest) की पहचान — यही वह बिंदु है जहाँ SDO सबसे अधिक गलती करते हैं
“शासकीय हित” का अर्थ क्या है?
विधायिका ने जानबूझकर “शासकीय हित” को संकीर्ण रूप से परिभाषित नहीं किया है। इसका व्यापक अर्थ है और इसमें अनेक परिस्थितियाँ सम्मिलित हैं। न्यायिक निर्णयों और विधिक सिद्धांतों के आधार पर, निम्नलिखित श्रेणियों में शासकीय हित सम्बद्ध माना जाना चाहिए:
प्रथम श्रेणी — भूमि का स्वामित्व शासकीय हो: जहाँ विवादित भूमि शासकीय भूमि (Government land) के रूप में राजस्व अभिलेखों में दर्ज है — चाहे वह चरनोई (grazing land), आबादी भूमि, काबिल कश्त, या किसी अन्य श्रेणी की शासकीय भूमि हो। MCRC-28951-2022 (सर्वे नं. 33/7 का मामला) इसका उत्तम उदाहरण है, जहाँ चरनोई भूमि को पट्टे पर दिया गया था और पट्टाधारी ने अवैध हस्तांतरण किया। इस प्रकार के मामले में SDO को तुरंत Collector को भेजना चाहिए था।
द्वितीय श्रेणी — भूमि पर शासकीय पट्टा (Government Lease) हो: SA-327-2016 का मामला स्पष्ट करता है कि जहाँ शासकीय भूमि पट्टे पर दी गई हो और उस पट्टे से संबंधित कोई प्रविष्टि संशोधित की जा रही हो, वहाँ शासकीय हित प्रत्यक्ष रूप से सम्बद्ध है।
तृतीय श्रेणी — संशोधन से शासकीय राजस्व प्रभावित हो: जहाँ प्रविष्टि का संशोधन भू-राजस्व, भू-उपयोग शुल्क, या किसी अन्य शासकीय देय राशि को प्रभावित करे। उदाहरण के लिए — कृषि भूमि को आवासीय भूमि के रूप में दर्ज करना या इसके विपरीत, क्योंकि इससे भू-उपयोग परिवर्तन शुल्क (diversion charges) और भू-राजस्व की दर प्रभावित होती है।
चतुर्थ श्रेणी — सार्वजनिक उपयोग की भूमि: मार्ग, नाले, तालाब, श्मशान, चारागाह, खेल का मैदान आदि — ये सभी सार्वजनिक प्रयोजन की भूमि हैं जिन पर शासन का प्रत्यक्ष हित है। इनसे संबंधित किसी भी संशोधन में शासकीय हित स्वयमेव सम्बद्ध होता है।
पंचम श्रेणी — जहाँ संशोधन से निजी पक्ष शासन के विरुद्ध अधिकार का दावा कर सके: WP-28537-2024 में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि नामांतरण आदेश से स्वामित्व तय नहीं होता, किन्तु व्यवहार में लोग राजस्व प्रविष्टियों को “उपधारणात्मक साक्ष्य” (presumptive evidence) के रूप में प्रयोग करते हैं। यदि कोई संशोधन ऐसा है जो भविष्य में शासन के विरुद्ध स्वामित्व दावे का आधार बन सकता है, तो उसमें शासकीय हित सम्बद्ध है।
🔷 III. SDO द्वारा प्रायः की जाने वाली गलतियाँ — और क्यों?
गलती 1: “शासकीय हित” को संकीर्ण अर्थ में समझना
अधिकांश SDO केवल उन्हीं मामलों को शासकीय हित से जुड़ा मानते हैं जहाँ भूमि का खाता “शासकीय” श्रेणी में दर्ज है। वे यह नहीं समझते कि शासकीय पट्टा-भूमि, सार्वजनिक उपयोग की भूमि, या ऐसी भूमि जहाँ संशोधन से शासकीय राजस्व प्रभावित हो — ये सभी “शासकीय हित” के दायरे में आती हैं। इसका मूल कारण यह है कि SDO स्तर पर विधिक प्रशिक्षण (legal training) प्रायः पर्याप्त नहीं होता और धारा 115 के परन्तुकों की गहन व्याख्या नहीं सिखाई जाती।
गलती 2: तहसीलदार की रिपोर्ट में शासकीय हित का उल्लेख न होना
धारा 115(2)(a) के अनुसार SDO को तहसीलदार से लिखित रिपोर्ट लेनी होती है। किन्तु तहसीलदार प्रायः अपनी रिपोर्ट में यह स्पष्ट उल्लेख नहीं करते कि मामले में शासकीय हित सम्बद्ध है या नहीं। इसके अभाव में SDO भी इस पहलू पर ध्यान नहीं देता और स्वयं ही आदेश पारित कर देता है।
गलती 3: SDO द्वारा शासकीय हित के मामले में स्वयं आदेश पारित कर देना
WP-24758-2024 इसका सटीक उदाहरण है। इस मामले में तहसीलदार ने कार्रवाई की (जो कि पहले ही अक्षेत्राधिकार थी), और पुनरीक्षण में अपर कलेक्टर ने बिना धारा 115 के क्षेत्राधिकार का परीक्षण किए, एक “cryptic” आदेश से तहसीलदार के आदेश की पुष्टि कर दी। उच्च न्यायालय ने दोनों आदेश निरस्त करते हुए स्पष्ट कहा कि मामला SDO का था, और यदि शासकीय हित सम्बद्ध है तो Collector का।
गलती 4: पाँच वर्ष पुरानी प्रविष्टि के लिए Collector की अनुमति न लेना
धारा 115(1) का पहला परन्तुक स्पष्ट कहता है कि पाँच वर्ष से पुरानी प्रविष्टि के संशोधन हेतु Collector की पूर्व लिखित अनुमति आवश्यक है। किन्तु व्यवहार में SDO प्रायः बिना Collector की अनुमति लिए ही पुरानी प्रविष्टियों में संशोधन कर देते हैं। यह आदेश शून्य (void ab initio) होता है।
🔷 IV. Collector को क्या करना चाहिए — एक व्यावहारिक कार्य-योजना (Action Plan)
(क) प्रशासनिक निर्देश (Standing Order) जारी करना:
Collector को एक स्थायी आदेश जारी करना चाहिए जिसमें “शासकीय हित” की विस्तृत श्रेणियाँ स्पष्ट की गई हों — जैसा कि ऊपर पाँच श्रेणियों में वर्णित है। इस आदेश में यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि SDO यदि संदेह में भी हो कि शासकीय हित सम्बद्ध है या नहीं, तो वह मामला Collector को भेजेगा, न कि स्वयं निर्णय लेगा। “When in doubt, refer up” — यह सिद्धांत लागू होना चाहिए।
(ख) तहसीलदार की रिपोर्ट का प्रारूप (Format) निर्धारित करना:
धारा 115(2)(a) के अंतर्गत तहसीलदार से प्राप्त होने वाली लिखित रिपोर्ट में एक अनिवार्य कॉलम होना चाहिए — “क्या इस मामले में शासकीय हित सम्बद्ध है? (हाँ/नहीं) — यदि हाँ, तो किस प्रकार का?” इससे SDO का ध्यान स्वतः इस बिंदु पर जाएगा।
(ग) पंच-वर्षीय परिसीमा (Five-Year Limitation) का रजिस्टर:
Collector कार्यालय में एक पृथक रजिस्टर रखा जाना चाहिए जिसमें SDO द्वारा धारा 115(1) के परन्तुक के अंतर्गत भेजे गए सभी अनुमति-प्रकरणों (5 वर्ष से पुरानी प्रविष्टि) का अभिलेख हो। इससे दो लाभ होंगे: एक, Collector को पता रहेगा कि कितने मामलों में पुरानी प्रविष्टियाँ संशोधित हो रही हैं; और दो, यदि कोई SDO बिना अनुमति संशोधन करे, तो ऑडिट में पकड़ा जा सके।
(घ) शासकीय हित के मामलों में Collector द्वारा निर्णय की प्रक्रिया:
जब धारा 115(2) के परन्तुक के अंतर्गत SDO मामला Collector को भेजे, तब Collector को धारा 115(3) के अनुसार स्वयं जाँच करनी होती है। यहाँ “shall make such enquiry” का अर्थ है कि Collector केवल SDO की रिपोर्ट पर निर्भर नहीं रह सकता — उसे स्वतंत्र जाँच करनी होगी, जिसमें स्थल निरीक्षण, अभिलेखों का परीक्षण, और पक्षकारों की सुनवाई शामिल हो सकती है। SA-327-2016 में Collector ने कमिश्नर की जाँच रिपोर्ट के आधार पर कार्रवाई की — यह एक उत्तम प्रथा (best practice) है।
(ङ) “Speaking Order” अनिवार्य करना:
WP-24758-2024 में उच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से अपर कलेक्टर के आदेश को “cryptic” कहकर निरस्त किया। इससे यह सबक है कि Collector (या उसकी ओर से कार्य करने वाला अपर कलेक्टर) जो भी आदेश पारित करे, वह कारण-सहित आदेश (reasoned and speaking order) होना चाहिए। आदेश में स्पष्ट रूप से उल्लेख होना चाहिए: शासकीय हित किस प्रकार सम्बद्ध है, तहसीलदार की रिपोर्ट में क्या पाया गया, पक्षकारों ने क्या कहा, और किन कारणों से यह निर्णय लिया गया।
🔷 V. न्यायिक दृष्टांतों से सीख — SDO को क्या नहीं पता होता?
दृष्टांत 1 (WP-24758-2024): क्षेत्राधिकार की दोहरी त्रुटि
इस मामले में दो स्तर पर गलती हुई। पहली — तहसीलदार ने धारा 70 के अंतर्गत कार्रवाई की, जबकि मामला धारा 115 के अंतर्गत SDO का था। दूसरी — अपर कलेक्टर ने पुनरीक्षण में इस मूलभूत क्षेत्राधिकार दोष को नहीं देखा। SDO को यह जानना आवश्यक है कि राजस्व अभिलेखों में कब्जे के आधार पर बंटवारा दर्ज करना, नक्शे में सुधार करना, सीमा निर्धारण — ये सभी धारा 115 के क्षेत्राधिकार में आते हैं, धारा 70 के नहीं। और यदि इनमें शासकीय भूमि शामिल है (जैसे सड़क/राजमार्ग से लगी भूमि), तो SDO को मामला Collector को भेजना अनिवार्य है।
दृष्टांत 2 (SA-327-2016): Collector का Suo Motu Revision और शासकीय भूमि
इस मामले में नायब तहसीलदार ने शासकीय भूमि का अवैध पट्टा दिया। Collector ने धारा 50 के अंतर्गत स्वप्रेरणा पुनरीक्षण में उसे निरस्त किया। यहाँ SDO की भूमिका महत्वपूर्ण थी — SDO की जाँच के आधार पर ही Collector को अवैधता की जानकारी मिली, जिससे 180 दिन की परिसीमा की गणना हुई। इससे यह सीख मिलती है कि SDO को शासकीय भूमि संबंधी किसी भी संदिग्ध प्रविष्टि या आवंटन की जानकारी तुरंत Collector को देनी चाहिए — क्योंकि विलंब होने पर Collector का Suo Motu Revision भी परिसीमा से बाधित हो सकता है।
दृष्टांत 3 (MCRC-28951-2022): अवैध नामांतरण में FIR
इस मामले में शासकीय पट्टा-भूमि का अवैध हस्तांतरण हुआ और नामांतरण अभिलेखों में हेराफेरी की गई। Collector ने FIR दर्ज कराई, जिसे उच्च न्यायालय ने वैध माना। SDO को यह समझना चाहिए कि जहाँ शासकीय अभिलेखों में जालसाजी (forgery/manipulation) का तत्व पाया जाए, वहाँ मामला केवल राजस्व सुधार तक सीमित नहीं रहता — यह दांडिक (criminal) कार्रवाई का भी विषय बनता है, और ऐसे मामले तुरंत Collector के संज्ञान में लाने चाहिए।
🔷 VI. सारांश — Collector हेतु Checklist
Collector को प्रत्येक धारा 115 प्रकरण में निम्न बिंदुओं का सत्यापन करना चाहिए:
पहला जाँच-बिंदु: क्या मामला वास्तव में धारा 115 का है, या किसी अन्य धारा (जैसे 70, 68, 109, 110) का? — क्षेत्राधिकार की सही पहचान सबसे पहला कदम है।
दूसरा जाँच-बिंदु: क्या प्रविष्टि 5 वर्ष से पुरानी है? — यदि हाँ, तो क्या Collector की पूर्व लिखित अनुमति ली गई है? यदि नहीं, तो SDO की कार्रवाई शून्य है।
तीसरा जाँच-बिंदु: क्या शासकीय हित किसी भी रूप में सम्बद्ध है? — ऊपर वर्णित पाँच श्रेणियों के आलोक में। यदि हाँ, तो SDO ने मामला Collector को भेजा है या स्वयं आदेश पारित कर दिया? यदि SDO ने स्वयं आदेश पारित किया, तो वह आदेश अक्षेत्राधिकार (without jurisdiction) होगा।
चौथा जाँच-बिंदु: क्या तहसीलदार की लिखित रिपोर्ट प्राप्त की गई है? — धारा 115(2)(a) के अनुसार यह अनिवार्य शर्त है। बिना तहसीलदार की रिपोर्ट के पारित आदेश प्रक्रियात्मक दोष से ग्रस्त होगा।
पाँचवाँ जाँच-बिंदु: क्या सभी हितबद्ध पक्षकारों को सुनवाई का अवसर दिया गया? — WP-24758-2024 में एकपक्षीय स्थल निरीक्षण रिपोर्ट को नैसर्गिक न्याय (natural justice) का उल्लंघन माना गया।
छठा जाँच-बिंदु: क्या आदेश “speaking order” है? — कारणों का स्पष्ट उल्लेख, अभिलेखीय साक्ष्य का संदर्भ, और पक्षकारों के तर्कों पर विचार — ये सब आदेश में होना चाहिए।

