अवयस्क बच्चों की अभिरक्षा में बाल कल्याण सर्वोपरि – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

अवयस्क बच्चों की अभिरक्षा में बाल कल्याण सर्वोपरि – मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय

न्यायालय एवं निर्णय तिथि

मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर माननीय न्यायमूर्ति शील नागू एवं माननीय न्यायमूर्ति विनय सराफ निर्णय दिनांक: 17 जनवरी, 2024 प्रथम अपील क्रमांक 1874/2023


संक्षिप्त तथ्य

यह मामला एक माता द्वारा अपने दो अवयस्क पुत्रों की अभिरक्षा (Custody) प्राप्त करने हेतु दायर अपील से संबंधित है।

अपीलार्थी (माता) का विवाह प्रत्यर्थी (पिता) से वर्ष 2007 में हुआ था। इस विवाह से दो पुत्र उत्पन्न हुए – एक का जन्म 2009 में तथा दूसरे का 2012 में हुआ। माता जुलाई 2009 से पृथक रह रही थी और दोनों बच्चे अपने पिता के साथ निवास कर रहे थे।

माता ने संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 12 के अंतर्गत फैमिली कोर्ट, कटनी में आवेदन दायर किया था जिसमें उन्होंने यह तर्क दिया कि पिता आर्थिक रूप से सक्षम नहीं है और माता होने के नाते तथा शिक्षिका के व्यवसाय में होने के कारण वे बच्चों का बेहतर पालन-पोषण कर सकती हैं।

पिता ने इन आरोपों का खंडन किया और बताया कि वे शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से सक्षम हैं, बच्चे केन्द्रीय विद्यालय में पढ़ रहे हैं और उनका कल्याण पिता के साथ रहने में ही है।

फैमिली कोर्ट ने दोनों पक्षों के साक्ष्य दर्ज करने के पश्चात माता का आवेदन खारिज कर दिया। इसी आदेश के विरुद्ध माता ने उच्च न्यायालय में अपील दायर की।


विधिक प्रावधान जिन पर विचार किया गया

न्यायालय ने निम्नलिखित विधिक प्रावधानों पर विचार किया:

  1. संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 17 – जो संरक्षक नियुक्ति में विचारणीय बिंदुओं का उल्लेख करती है
  2. संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 की धारा 19(b) – जो पिता के जीवित रहते संरक्षक नियुक्ति पर प्रतिबंध लगाती है
  3. मुस्लिम पर्सनल लॉ (मुल्ला) की धारा 357 – जो सात वर्ष से अधिक आयु के बालक की अभिरक्षा पिता को देती है

न्यायालय का निर्णय एवं कारण

उच्च न्यायालय ने फैमिली कोर्ट के आदेश को उचित ठहराते हुए अपील खारिज कर दी। न्यायालय ने निम्नलिखित कारण दिए:

प्रथम कारण: बाल कल्याण सर्वोपरि सिद्धांत न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभिरक्षा के मामलों में बच्चों का कल्याण (Welfare of Child) सर्वोपरि विचारणीय बिंदु है। माता-पिता का कानूनी अधिकार या आर्थिक संपन्नता निर्णायक नहीं है, बल्कि बच्चों का हित ही निर्णायक है।

द्वितीय कारण: बच्चों की स्वयं की इच्छा धारा 17(3) के अनुसार यदि अवयस्क इतना बड़ा हो कि वह बुद्धिमत्तापूर्ण वरीयता (Intelligent Preference) बना सके, तो न्यायालय उस वरीयता पर विचार कर सकता है। इस मामले में बड़ा पुत्र लगभग 14 वर्ष का था और छोटा पुत्र लगभग 11 वर्ष का था। दोनों ने फैमिली कोर्ट के समक्ष स्पष्ट रूप से अपने पिता के साथ रहने की इच्छा व्यक्त की थी।

तृतीय कारण: मुस्लिम पर्सनल लॉ का प्रावधान मुस्लिम विधि के अनुसार सात वर्ष से अधिक आयु के बालक की अभिरक्षा का अधिकार पिता को है, जब तक कि पिता संरक्षक के रूप में अयोग्य न हो। इस मामले में पिता की अयोग्यता सिद्ध नहीं हुई।

चतुर्थ कारण: बच्चों की वर्तमान स्थिति बच्चे वर्ष 2021 से अपने पिता के साथ रह रहे थे, अच्छे विद्यालय में पढ़ रहे थे और उनकी समस्त आवश्यकताएं पूर्ण हो रही थीं। न्यायालय ने कहा कि ऐसी स्थिति में बच्चों के हित में यही है कि वे पिता के साथ ही रहें।


सर्वोच्च न्यायालय के उद्धृत निर्णय

न्यायालय ने निम्नलिखित महत्वपूर्ण निर्णयों का संदर्भ दिया:

  1. मौसमी मोइत्रा गांगुली बनाम जयंत गांगुली, (2008) 7 SCC 673
  2. स्मृति मदन कंसाग्रा बनाम पेरी कंसाग्रा, (2021) 12 SCC 289
  3. रोजी जेकब बनाम जेकब ए. चक्रमक्कल, (1973) 1 SCC 840

इन निर्णयों में स्थापित सिद्धांत यह है कि बच्चे माता-पिता की संपत्ति नहीं हैं और अभिरक्षा का निर्धारण करते समय न्यायालय को बच्चों के समग्र कल्याण पर ध्यान देना चाहिए।


मुलाकात का अधिकार (Visitation Rights)

हालांकि अपील खारिज की गई, परंतु न्यायालय ने माता को मुलाकात का अधिकार प्रदान किया:

  • माता को प्रतिमाह एक बार दो घंटे के लिए बच्चों से मिलने का अधिकार दिया गया
  • मुलाकात किसी तटस्थ स्थान जैसे उद्यान, रेस्तरां आदि पर होगी
  • तिथि, समय और स्थान पारस्परिक सहमति से तय किया जाएगा

निष्कर्ष एवं शिक्षा

यह निर्णय निम्नलिखित महत्वपूर्ण सिद्धांतों को स्थापित करता है:

  1. बाल अभिरक्षा के मामलों में बच्चों का कल्याण सर्वोपरि है, न कि माता-पिता के अधिकार
  2. आर्थिक संपन्नता अकेले निर्णायक कारक नहीं है
  3. यदि बच्चे पर्याप्त आयु के हैं तो उनकी इच्छा का सम्मान किया जाना चाहिए
  4. मुस्लिम विधि में सात वर्ष से अधिक आयु के बालक की अभिरक्षा पिता को प्राप्त होती है
  5. अभिरक्षा न मिलने पर भी मुलाकात का अधिकार प्रदान किया जा सकता है

संदर्भ: प्रथम अपील क्रमांक 1874/2023, मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, जबलपुर

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