भूमि अदला-बदली (एक्सचेंज डीड) के बाद नामांतरण विवाद: जब सामने वाला किसान मर जाए तो क्या होगा? – एक केस स्टडी






भूमि अदला-बदली और नामांतरण विवाद – केस स्टडी


भूमि अदला-बदली (एक्सचेंज डीड) के बाद नामांतरण विवाद

जब सामने वाला किसान मर जाए तो क्या होगा? – एक केस स्टडी

केस का विवरण: द्वितीय अपील क्रमांक 169/2020  | 
निर्णय दिनांक: 31 मार्च, 2023  | 
पीठ: माननीय न्यायमूर्ति श्री गुरपाल सिंह आहलूवालिया  | 
न्यायालय: माननीय उच्च न्यायालय, मध्य प्रदेश, जबलपुर खंडपीठ

भाग 1 – संक्षिप्त तथ्य (Brief Facts)

यह मामला ग्राम छामराछ, तहसील देवसर, जिला सिंगरौली (मध्य प्रदेश) की एक कृषि भूमि से जुड़ा हुआ है। मूल भूमिस्वामी (खसरा क्रमांक 1590, क्षेत्रफल 2.94 हेक्टेयर) की मृत्यु के बाद उनके तीन पुत्रों और एक चौथे भाई के नाम पर भूमि बराबर हिस्सों में दर्ज हुई थी। चौथे भाई ने अपने हिस्से का बंटवारा अपने पुत्रों में कर दिया था। शेष तीन भाइयों (वादीगण) के पास कुल 2.21 हेक्टेयर भूमि बची थी।

विवाद की जड़ यह थी कि एक पड़ोसी किसान (प्रतिवादीगण 1 व 2) का यह दावा था कि उन्हें मूल भूमिस्वामी के साथ आपसी सहमति से अदला-बदली (mutual exchange) में 0.95 हेक्टेयर भूमि प्राप्त हुई थी, और तब से वे उस भूमि पर वास्तविक कब्जे में थे। यद्यपि शुरुआत में उनके नाम राजस्व अभिलेखों में दर्ज नहीं हो पाए थे, परन्तु बाद में उन्होंने अपने नाम पटवारी अमल में करा लिए, और उसके बाद उक्त भूमि को आगे एक तीसरे व्यक्ति (प्रतिवादी क्रमांक 3) को विधिवत पंजीकृत विक्रय पत्र दिनांक 06.10.2008 के माध्यम से रुपये 2,40,000/- में बेच दिया।

मूल भूमिस्वामी के पुत्रों (वादीगण) ने इसके विरुद्ध सिविल न्यायालय में स्वत्व घोषणा (declaration of title), स्थायी निषेधाज्ञा (permanent injunction) तथा वैकल्पिक रूप से कब्जे की पुनः प्राप्ति (recovery of possession) हेतु वाद दायर किया। उनका मुख्य तर्क था कि उन्होंने या उनके पिता ने प्रतिवादी 1 व 2 को कोई भूमि नहीं दी थी, और न ही कोई पंजीकृत अदला-बदली विलेख (registered exchange deed) निष्पादित हुआ था।

विचारण न्यायालय (Trial Court) ने वर्ष 2014 में वादीगण के दावे को खारिज कर दिया। परन्तु प्रथम अपीलीय न्यायालय (Additional District Judge, देवसर) ने दिनांक 13.12.2019 को अपील स्वीकार करते हुए वादीगण के पक्ष में स्वत्व घोषित कर दिया। इसके विरुद्ध प्रतिवादी क्रमांक 3 (जिसने सद्भावपूर्वक भूमि खरीदी थी) ने उच्च न्यायालय के समक्ष द्वितीय अपील दायर की।

मुख्य कानूनी प्रश्न (Substantial Question of Law)

क्या भूमि की अदला-बदली केवल मौखिक या आपसी सहमति के आधार पर वैध मानी जा सकती है, अथवा इसके लिए पंजीकरण अधिनियम, 1908 की धारा 17 एवं संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 118 के अनुसार पंजीकृत विलेख (registered deed) आवश्यक है? और क्या केवल राजस्व अभिलेखों में नामांतरण होने से भूमि का स्वामित्व (title) स्थानांतरित हो जाता है?

भाग 2 – अंतिम निर्णय (Final Decision)

माननीय उच्च न्यायालय ने द्वितीय अपील को खारिज कर दिया तथा प्रथम अपीलीय न्यायालय के उस आदेश को बरकरार रखा जिसमें मूल भूमिस्वामी के वारिसों (वादीगण) को भूमि का असली स्वामी घोषित किया गया था। अदला-बदली के दावे को अस्वीकार किया गया तथा प्रतिवादी क्रमांक 3 द्वारा खरीदा गया विक्रय पत्र वादीगण के अधिकारों के अधीन माना गया।

भाग 3 – निर्णय के मुख्य कारण (Reasoning)

1. पंजीकृत अदला-बदली विलेख का अभाव घातक है

न्यायालय ने स्पष्ट किया कि मध्य प्रदेश भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 167 के अंतर्गत भूमिस्वामी आपसी सहमति से अपनी भूमि की अदला-बदली कर सकते हैं, परंतु यह अदला-बदली केवल मौखिक सहमति या कब्जे के परिवर्तन से वैध नहीं होती। संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 की धारा 118 के अनुसार अचल संपत्ति का विनिमय (exchange) उसी रीति से किया जाना चाहिए जिस रीति से उसका विक्रय किया जाता है। अर्थात्, सौ रुपये या उससे अधिक मूल्य की भूमि की अदला-बदली के लिए पंजीकृत विलेख (Registered Exchange Deed) होना अनिवार्य है। प्रस्तुत मामले में प्रतिवादीगण ऐसा कोई भी पंजीकृत दस्तावेज़ प्रस्तुत नहीं कर सके, अतः उनका अदला-बदली का दावा कानूनी रूप से अमान्य पाया गया।

2. नामांतरण से स्वामित्व सिद्ध नहीं होता

न्यायालय ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के अनेक निर्णयों (विशेषकर Sawarni vs. Inder Kaur तथा Balwant Singh vs. Daulat Singh) का हवाला देते हुए दृढ़ता से कहा कि राजस्व अभिलेखों में नामांतरण होने से किसी व्यक्ति को भूमि का स्वामित्व प्राप्त नहीं हो जाता और न ही पूर्व स्वामी का स्वामित्व समाप्त होता है। नामांतरण केवल भू-राजस्व की वसूली के राजकोषीय (fiscal) उद्देश्य से किया जाता है। स्वामित्व का प्रश्न केवल सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है।

3. कब्जा अकेले स्वामित्व का प्रमाण नहीं

प्रतिवादीगण का यह तर्क कि वे लंबे समय से उक्त भूमि पर कब्जे में थे और वादीगण ने कभी आपत्ति नहीं की, न्यायालय द्वारा स्वीकार नहीं किया गया। न्यायालय ने कहा कि बिना वैध दस्तावेज़ के लंबे समय का कब्जा अपने आप में स्वामित्व नहीं देता, जब तक कि प्रतिकूल कब्जे (adverse possession) की शर्तें (खुला, सतत, शत्रुतापूर्ण और 12 वर्ष से अधिक) पूर्ण रूप से सिद्ध न की जाएं। प्रतिवादीगण ने अपनी लिखित बहस में स्वयं को अदला-बदली से आये हुए भूमिस्वामी बताया, अर्थात् उन्होंने स्वयं वादीगण के मूल स्वामित्व को स्वीकार किया था – इस कारण प्रतिकूल कब्जे का दावा बनता ही नहीं।

4. राजस्व न्यायालय बनाम सिविल न्यायालय का अधिकार क्षेत्र

न्यायालय ने पुनः रेखांकित किया कि तहसीलदार, अनुविभागीय अधिकारी (SDO) तथा आयुक्त (Commissioner) जैसे राजस्व अधिकारियों को स्वामित्व या किसी दस्तावेज़ की वैधता तय करने का अधिकार नहीं है। यदि किसी पक्षकार को स्वामित्व, धोखाधड़ी या दस्तावेज़ की वैधता को लेकर विवाद है, तो उसका एकमात्र रास्ता सक्षम सिविल न्यायालय में वाद दायर करना है। राजस्व न्यायालय द्वारा किया गया नामांतरण सदैव सिविल न्यायालय के अंतिम निर्णय के अधीन रहेगा।

भाग 4 – पाठकों के लिए मुख्य सीख (Key Lessons)

इस निर्णय से भूमि अदला-बदली करने वाले किसानों तथा ऐसे ही प्रकरणों में फँसे हुए व्यक्तियों के लिए कई महत्वपूर्ण व्यावहारिक बातें निकलकर सामने आती हैं, जिन्हें समझना आवश्यक है।

पहली बात यह है कि भूमि की अदला-बदली कभी भी मौखिक सहमति या केवल कब्जे के अदला-बदली से पूरी नहीं मानी जा सकती। चाहे दोनों पक्ष ईमानदार हों, चाहे गाँव-समाज के सामने तय हुआ हो – जब तक उप-पंजीयक के समक्ष पंजीकृत अदला-बदली विलेख (Registered Exchange Deed) निष्पादित न हो, तब तक भूमि का स्वामित्व क़ानूनी रूप से स्थानांतरित नहीं होता।

दूसरी बात यह है कि पंजीकृत अदला-बदली विलेख होने के तुरंत बाद, चाहे भूमि अलग-अलग तहसीलों में स्थित हो, दोनों पक्षों को अपनी-अपनी तहसील में नामांतरण की कार्यवाही पूर्ण कराकर खसरा-बी-1 (पटवारी अमल) में अपना नाम चढ़वा लेना चाहिए। यदि कोई एक तरफ का नामांतरण अधूरा रह जाता है, तो भविष्य में दूसरे पक्ष की मृत्यु हो जाने पर उसके वारिसों के साथ विवाद उत्पन्न होने की संभावना अत्यंत बढ़ जाती है।

तीसरी बात यह है कि यदि सामने वाले पक्षकार की मृत्यु हो जाती है और उसके वारिसों ने उक्त भूमि का मृतक नामांतरण करवा लिया है, तो आपको SDM/आयुक्त के समक्ष अपील में निम्नलिखित बातें मज़बूती से उठानी चाहिए: पंजीकृत अदला-बदली विलेख की प्रमाणित प्रति प्रस्तुत करें; मूल नामांतरण आदेश (जो दूसरी तहसील से पारित हुआ था) की प्रति प्रस्तुत करें जिसमें आपके पक्ष में आदेश था; कब्जे का प्रमाण (फसल बीमा, बिजली बिल, ट्यूबवेल का बिल, सिंचाई दस्तावेज़, गवाहों के हलफनामे) प्रस्तुत करें; और यह स्पष्ट करें कि मृतक के जीवनकाल में ही नामांतरण आदेश पारित हो चुका था, मात्र पटवारी अमल शेष था।

चौथी बात यह है कि चूँकि नामांतरण का प्रश्न मात्र राजकोषीय है और स्वामित्व का प्रश्न नहीं, अतः यदि राजस्व अधिकारी मृतक के वारिसों की अपील स्वीकार कर भी लेते हैं, तो भी आपका मूल स्वत्व (title) पंजीकृत अदला-बदली विलेख के बल पर अक्षुण्ण रहेगा। ऐसी स्थिति में आप सक्षम सिविल न्यायालय में स्वत्व घोषणा एवं स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दायर कर सकते हैं, जो अंततः अंतिम और बाध्यकारी होगा।

पाँचवीं बात और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि सिविल वाद दायर करने में विलंब न करें, क्योंकि परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुच्छेद 58 तथा 65 के अनुसार स्वत्व घोषणा के लिए 3 वर्ष तथा कब्जे के लिए 12 वर्ष की अधिकतम अवधि निर्धारित है। जिस दिन से आपको पता चलता है कि आपका नाम अभिलेखों से हटाया जा रहा है या मृतक के वारिसों ने उक्त भूमि पर अधिकार जताया है, उसी दिन से परिसीमा अवधि प्रारंभ मानी जा सकती है।

निष्कर्ष:

भूमि अदला-बदली के मामलों में पंजीकृत विलेख ही असली रक्षा-कवच है। नामांतरण और कब्जा महत्वपूर्ण हैं, परन्तु ये केवल पंजीकृत विलेख के पूरक हैं, उसका विकल्प नहीं। यदि आपके पास पंजीकृत एक्सचेंज डीड है तो SDM/आयुक्त की किसी भी अपील में आपकी स्थिति मजबूत है, और अंततः सिविल न्यायालय में आपका स्वत्व सुरक्षित रह सकता है।

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