बैंक ऋण वसूली में गिरवी संपत्ति पर पुनः कब्जा दिलाने का अधिकार
मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर
रिट याचिका संख्या 1681/2025
निर्णय दिनांक: 16 जून, 2025
संक्षिप्त तथ्य (Brief Facts)
यह मामला एक वित्तीय संस्था (बैंक/फाइनेंस कंपनी) और एक कर्जदार के बीच का है। मामले की मुख्य बातें इस प्रकार हैं:
ऋण और चूक की स्थिति: याचिकाकर्ता वित्तीय संस्था ने एक व्यक्ति को संपत्ति गिरवी रखकर ऋण दिया था। कर्जदार ने ऋण की किस्तें चुकाना बंद कर दिया, जिसके बाद वित्तीय संस्था ने सरफेसी अधिनियम, 2002 की धारा 13(2) के तहत नोटिस भेजा। कर्जदार ने फिर भी भुगतान नहीं किया।
पहली कार्यवाही: वित्तीय संस्था ने सरफेसी अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत जिला मजिस्ट्रेट, ग्वालियर के समक्ष आवेदन दिया। जिला मजिस्ट्रेट ने दिनांक 05-01-2023 को आदेश पारित कर संबंधित तहसीलदार को गिरवी संपत्ति का कब्जा लेने का निर्देश दिया।
कब्जा मिलने में विलंब: जिला मजिस्ट्रेट के आदेश के बावजूद कब्जा नहीं मिला, जिसके कारण वित्तीय संस्था को रिट याचिका संख्या 17288/2023 और अवमानना याचिका 2252/2024 दायर करनी पड़ी। अंततः दिनांक 30-07-2024 को वित्तीय संस्था को कब्जा सौंपा गया।
समस्या का पुनः उत्पन्न होना: कब्जा मिलने के बाद कर्जदार और उसके परिवार के सदस्य अपना सामान निकालने के बहाने गिरवी संपत्ति में पुनः प्रवेश कर गए और वहां से जाने को तैयार नहीं हुए।
प्रशासन का रुख: जब वित्तीय संस्था ने पुनः प्रशासनिक अधिकारियों से सहायता मांगी, तो उन्होंने यह कहकर मना कर दिया कि जिला मजिस्ट्रेट का दिनांक 05-01-2023 का आदेश पहले ही निष्पादित हो चुका है और अब उसे पुनः निष्पादित नहीं किया जा सकता।
पक्षकारों के तर्क
याचिकाकर्ता (वित्तीय संस्था) का तर्क: प्रशासनिक अधिकारी सरफेसी अधिनियम के प्रावधानों का पालन नहीं कर रहे हैं। सुरक्षित ऋणदाता को सहायता प्रदान करना उनका कानूनी कर्तव्य है। अधिकारियों का यह तर्क कि आदेश पुनः निष्पादित नहीं हो सकता, विधि के शासन का मजाक उड़ाने जैसा है।
प्रत्यर्थी (राज्य) का तर्क: वित्तीय संस्था को कब्जा सौंप दिया गया था, किंतु उसने उसे बनाए नहीं रखा। एक बार कब्जा सौंपने के बाद सरफेसी अधिनियम के प्रावधानों का पालन हो गया। याचिकाकर्ता के पास वैकल्पिक उपचार उपलब्ध है।
न्यायालय का निर्णय एवं कारण
मुख्य निष्कर्ष:
प्रथम: न्यायालय ने सरफेसी अधिनियम की धारा 14 का अवलोकन करते हुए स्पष्ट किया कि इस प्रावधान में ऐसा कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है जो कब्जे के आदेश को पुनः निष्पादित करने या सुरक्षित ऋणदाता को पुनः सहायता प्रदान करने से रोकता हो।
द्वितीय: न्यायालय ने कहा कि अवैधता को स्थायी नहीं रहने दिया जा सकता (“Illegality cannot be permitted to be perpetuated”)। कर्जदार ने छल से (सामान निकालने के बहाने) संपत्ति में पुनः प्रवेश किया, यह अवैध कब्जा है।
तृतीय: कर्जदार की इस चालाकी को पुरस्कृत नहीं किया जा सकता। जब कर्जदार ऋण चुकाने में विफल रहा है, तो गिरवी संपत्ति पर सुरक्षित ऋणदाता का अधिकार है।
चतुर्थ: न्यायालय ने यह भी कहा कि कर्जदार के विरुद्ध अवैध प्रवेश (Criminal Trespass) और अन्य संबंधित अपराधों के लिए आपराधिक कार्यवाही भी की जा सकती है।
पंचम: वैकल्पिक उपचार के तर्क को खारिज करते हुए न्यायालय ने कहा कि चूंकि सरफेसी अधिनियम स्वयं ऋण वसूली की व्यवस्था प्रदान करता है, अतः वर्तमान परिस्थितियों में याचिकाकर्ता के पास कोई प्रभावी वैकल्पिक उपचार नहीं है।
उद्धृत न्यायिक दृष्टांत:
न्यायालय ने बंबई उच्च न्यायालय के कोटक महिंद्रा बैंक बनाम महाराष्ट्र राज्य (2023) के निर्णय का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि जिला मजिस्ट्रेट के पास अपने आदेश को पुनः निष्पादित करने की शक्ति है और वह “फंक्टस ऑफिशियो” (कार्य समाप्त) नहीं हो जाता।
अंतिम आदेश
रिट याचिका स्वीकार।
प्रत्यर्थी अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि वे याचिकाकर्ता (वित्तीय संस्था) को आवश्यक सहायता प्रदान करें, कर्जदार को गिरवी संपत्ति से बेदखल करें और विधि के अनुसार संपत्ति का कब्जा याचिकाकर्ता को सौंपें।
इस निर्णय से सीख
यह निर्णय स्पष्ट करता है कि जब कोई कर्जदार छल-कपट से गिरवी संपत्ति में पुनः प्रवेश कर लेता है, तो प्रशासनिक अधिकारी यह नहीं कह सकते कि पहले का आदेश निष्पादित हो चुका है और अब कुछ नहीं किया जा सकता। सरफेसी अधिनियम का उद्देश्य बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ऋण वसूली में सहायता करना है, और इस उद्देश्य को विफल करने वाली किसी भी अवैध कार्यवाही को न्यायालय अनुमति नहीं देगा।
न्यायमूर्ति आनंद पाठक एवं न्यायमूर्ति हृदेश मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय, ग्वालियर पीठ

